पिघलता हिमालय से प्रकाशित पुस्तकें

‘रजनीगंधा मूल रूप से सन् 1965-66 की कृति है, जिसे स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती जी ने अपनी उस यात्रा के दौरान लिखा जब वह पहाड़ की दिखने में सरल किन्तु जटिल जिन्दगी से होते हुए भाबर और तराई के मैदानों का जीवन देख रहे थे। लेखक ने पहाड़ की रमणीय वादियों के साथ ही महानगरों की चिल्ल-पों के बीच साहित्य सृजन किया। स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती ने जीवन में संघर्षों व अभावों के बीच सृजन का तालमेल करते हुए जो कुछ रचा, वह उनसे ही सम्भव था। ‘रजनीगंधा’ उपन्यास जीवनभर संघर्ष करने वालों की कहानी है जो इस समाज से बार-बार टकराकर अपना रास्ता बनाते हैं। इस उपन्यास में घटनाक्रमों को जोड़ते हुए लेखक ने सच्चाईयां भी व्यक्त की हैं। जैसे- ‘‘सन्देह मनुष्य को पागल बना देता है। सन्देह के वशीभूत होकर मानव दानव सा व्यवहार कर डालता है। पवित्र आत्मा भी सन्देह के फेर में पड़कर कलुषित हो जाती है। हम अपने स्वजनों से मुँह मोड़ लेते हैं।’’, ‘‘कभी-कभी मनुष्य की मानवीय प्रवृत्ति हिंसात्मक हो जाती है। बुरे भावोें की रफ्तार से मन-जहाज के टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं।’’, ‘‘वह जीवन जीवन नहीं जो कराहों के साथ बीते। मानव की कराहें जब तक अन्तराल में सोई रहती हैं तब तक उनका अनुमान नहीं लगाया जा सकता। किन्तु जब वे प्रस्फुटित हो जाती हैं तब एक महान विस्फोट के साथ संसार के सामने प्रकट होती हैं, उसे हिला देती हैं।’’, ‘‘यह दुनियाँ नाट्यशाला है, देखो कब तक मेरा अभिनय समाप्त होता है।’’ ‘रजनीगंधा’ में लेखक ने गाँव-शहर के दृश्यों को जिस प्रकार प्रकृति और ऋतुओं के साथ जोड़ते हुए प्रस्तुत किया है वह शब्दों का पाण्डित्य प्रदर्शन मात्र न होकर उस पूरे वातावरण को हमारी आँखों के समक्ष प्रस्तुत कर देता है। उदाहरण के लिये- ‘‘गगन रिक्त हुआ, जलधरा का वेग शिथिल हो गया, नीलाकाश पर चाँद अपनी मन्द मुस्कुराहट के साथ उदय हुआ। प्रातः सूर्य अपनी ज्योतिर्मय रश्मियों के साथ गगनांगन में विहँस पड़ा।’’, ‘‘रजनी ने अपने तम पट से धरा को ढक लिया। स्वच्छ और नीले आकाश पर शीतल चन्द्र तारागणों के साथ धीरे-धीरे छोर से अपना मँुह खोलने लगा। राजू और राधा निद्रादेवी की गोद में जा छिपे थे।’’, ‘‘सावन का महीना था। आमों और कदम्बों पर पड़े हुए झूलों से सुन्दरियों की मधुर कूक आती और मानव समाज को आत्मविभोर कर देती। हवा के हल्के-हल्के झौंकों के साथ पानी की नन्हीं-नन्हीं बूंदें शरीर में एक सिहरन पैदा कर देती। इन्द्रबधूटियाँ धरा-बधू का सिन्दूर बनी हुई थी।’’

पहाड़ में जन्मे और प्रकृति के मनोरम दृश्यों से परिचित लेखक ने महानगरों के गाँवों की मनोहारी छवि को भी अपनी कलम से निबद्ध किया है। ‘रजनीगंधा’ की कहानी ज्यों-ज्यों आगे बढ़ती जाती है, समयानुसार वर्णन उसमें रंजकता पैदा करता है। फाल्गुन और जेठ महीने का वर्णन- ‘‘फागुन का मस्त महीना था। आम के वृक्ष अपने सिर पर मुकुट बाँधे दूल्हा बने थे। कोयल की कूक से चारों दिशायें सुरीली हो गयी थी।’’, ‘‘जेठ का महीना था। व्योम से भगवान भास्कर की किरणें नीचे उतर कर वसुन्धरा के वक्षस्थल को खाक कर रही थी। प्रकृति की हरियाली हवा के झौंको में उदस्थ हो गयी थी।’’

-पंकज उप्रेती

 

हिमालय संगीत एवं शोध समिति

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