पिघलता हिमालय से प्रकाशित पुस्तकें

‘‘उप्रेती’’ (राग-भाग हमारे) एक ऐसा दस्तावेज है जो आने वाली पीढ़ियों को बतायेगा कि उनकी जड़ें कहाँ हैं। दरअसल यह हमारे अपने राग हैं, जो अपने भाग के थे परन्तु इसको पुस्तकाकार देना भी जरूरी हो गया है। पिता स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती जी से बहुत सुना था कि पितामह स्व.राधबल्लभ उप्रेती जी ने बर्मा सहित कई यात्राएं करने के साथ ही जानकारियाँ जुटायी थीं। साथ ही प्रपितामह स्व.चिन्तामणि उप्रेती और स्व.कान्तिबल्लभ उप्रेती के समय ऐतिहासिक दस्तावेज व पुराने ग्रन्थों का भण्डार कुंजनपुर, गंगोलीहाट हमारे घर में था। गाँव के असल पधान कान्तिबल्लभ जी ही थे लेकिन सन्तान न होने के कारण छोटे भाई चिन्तामणि जी ने सब संभाला। इसके बाद पधानचारी अगली पीढ़ी में याने बड़बाज्यू राधाबल्लभ जी ने संभाल ली। इनके पुत्र याने पिता स्व.आनन्द बल्लभ जी परम्परा के हकदार हुए लेकिन उन्होंने समय की धार को पहचाना और अपने स्वभाव के अनुरूप कार्यों पर ध्यान दिया। बचपन के तीन साल में ही माता जीवन्ती देवी के निधन के बाद आनन्द बल्लभ जी संयुक्त परिवार में पले लेकिन उनका आकाशमन अपनों को टटोलने के साथ ही कलावृत्ति में रमा रहा। बचपन से ही उनकी रुचि लेखन की ओर थी और लेखक-सम्पादक-कथाकार के रूप में ही वह स्थापित हुए।

मैंने बचपन में बड़बाज्यू राधाबल्लभ जी से बहुत किस्से सुने थे और पाया वह आध्यात्म में पूरी तरह लीन हो चुके हैं। अध्यापक होने के नाते वह उपदेशात्मक बातें तो करते ही थे। उनका बड़ा पोता होने के कारण वह मुझे सूक्त रूप में कई बातें समझाते। पोते और बड़बाज्यू की वह बातें अति गोपनीय होती जिनमें रहस्य के साथ तर्क भी होते। थोड़ा बड़ा होने पर उन बातों को लेकर मैंने पिता आनन्द बल्लभ जी से जानकारी चाही तो उनकी भी अध्यापक वाली भूमिका सवाल करती लेकिन वह असाधरण थे। उनके तर्क, उनकी सूझ, उनकी समझ विषम परिस्थितियों में जिम्मेदारी संभालने के लिये तैयार करने वाली थी। उन्हीं के आशीर्वाद से मैं अपने बुजुर्गों की बातों को आगे बढ़ाने का साहस कर रहा हँू।

पुस्तक का स्वरूप देने से पहले कई बार सोचा कि बड़बाज्यू की हस्तलिखित सामग्री को आकार दिया जाए या नहीं क्यांेकि लिखते लिखते बाद में वह घर की उन बातों का भी उल्लेख करते जा रहे थे जिनका वास्ता समाज बनाने में सकारात्मक नहीं हो सकता है। अध्ययन से पता चलता है कि जीवन के उत्तरार्द्ध में जब उन्होंने अपने इतिहास को लिखना आरम्भ में वह धाराप्रवाह लिखने लगे। जिसमें उन्होंने उप्रेतियों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियाँ दीं। उसके बाद अपने घर-गृहस्थी के जंजाल का उल्लेख करते बर्मा की यात्रा का वर्णन किया है, जिसे वह सुनाया भी करते थे। अन्त में जब वह काफी उम्र के हो चुके थे पठन-पाठन तो करते थे और नियमित रूप से धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन भी करते रहे लेकिन लिखने में असमर्थ थे और कुछ खास-खास बातों को एक-एक पंक्ति में लिख दिया करते। रामनवमी 11 अप्रैल 1983 से उन्होंने अपने पूर्वजों के स्थान का वर्णन करते हुए लिखना शुरु किया और पूर्वजों की पीढ़ियों की चर्चा के बाद परिवार के राग शुरू कर दिये जो उनके भाग में थे, पिता के भाग में थे और हमारे भाग में हैं। लिखते- लिखते अन्त में उन्होंने लिखा है- ‘आज ता. 30.4.2000 को चि. पंकज की पी-एच.डी. की उपाधि से सम्मानित किये जाने की सूचना मिली। मेरी यही अत्यन्त इच्छा थी कि मैं अपने जीते जी यह देख सकूं।’ बूढ़ों की खुशी अपने बच्चों को किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ते देखकर होती है। फिर मैं तो बड़बाज्यू का सबसे बड़ा पोता जो था। इस प्रकार ‘‘उप्रेती’’ (राग-भाग हमारे: कन्नौज से मणकोट और कूं) के रूप में उन महत्वपूर्ण जानकारियों को दिया जा रहा है जो मौखिक इतिहास के रूप में और हमारे पूर्वजों द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी बतायी जाती रही हैं।

-डाॅ.पंकज उप्रेती

 

हिमालय संगीत एवं शोध समिति

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