पिघलता हिमालय से प्रकाशित पुस्तकें

लोक का उत्साह हमेशा सच्चा होता है। ग्राम्य जीवन को जब शहर की हवा लग जाती है तब वह फुर्तीला जरूर दिखाई देता है लेकिन उसकी उमंग मर चुकी होती है। शहर सुविधाओं का नाम है लेकिन वर्तमान में कंक्रीट के जंगल को शहर और इसमें भोग-विलास की भरमार को महानगर मान लिया गया है। गाँव से कस्बे, नगर और महानगर बनने का क्रम जारी है लेकिन ग्राम्य की ‘बहार’ को हमारे संस्कार इन सभी जगह पर स्थापित कर सकते हैं। ऐसे ही हैं शिक्षाविद् श्रीनिवास मिश्र। यूपी के रैचनपर, कोटवशुकुलपुर, लालगंज, प्रतापगढ़ के मिश्र जी गवईं संस्कृति से हैं जो लोक की सच्चाई है। अपने जमाने के पहलवान मिश्र जी आज भी अखाड़े की बात सुनकर जवान हो जाते हैं। शिक्षक के रूप में भी इन्होंने अखाड़े का अनुशासन बरकरार रखा है। तभी तो वह अपने विद्यार्थियों को पाठ पढ़ाने के साथ कभी शान्त रस और कभी वीर रस से भरी पंक्तियां सुनाकर मार्ग दिखाते रहे। जीवनभर सामाजिक जलसे- जुलूसों में उलझे मिश्र जी बहुत ही सीध-सरल पाठ अपने परिवार को भी पढ़ाया कि दुनिया के घरौंदे में रहना और पंछी फिर उड़ जाना...। एक अक्खड़ पहलवान और फक्कड़ शिक्षक को संभालने के लिये संयोग से उनकी धर्मपत्नी श्रीमती कमला मिश्र का योगदान भी कम नहीं कहा जा सकता है।

‘वीर भोग्या वसुन्ध्रा’ मिश्र जी की अन्तर्मन से लिखी रचनाओं का गुलदस्ता है। एक शिक्षक को विभिन्न कार्यक्रमों के दौरान मंचीय प्रस्तुति के लिये जिस प्रकार की रचनाएं चुननी पड़ती हैं, वह उन्होंने स्वयं रच डाली। अपनी सहज-सरल कविताओं को लय देने के लिये इन्होंने गीत भी गूंथ डाले। साथ ही लोक का खुमार लोकगीतों का मोह नहीं छोड़ सका है। इसके अलावा एक पहलवान और अपने समाज व देश के लिये सजग व्यक्ति का ओज इसमें है। श्री श्रीनिवास मिश्र-श्रीमती कमला मिश्र, इनके सुपुत्र डॉ.सन्तोष मिश्र-श्रीमती गीता मिश्र, पोतियों- शिवानी-हिमानी याने तीन पीढ़ियों द्वारा मेडिकल कालेज को शरीर दान देना वीर रस का व्यवहार ही है। मिश्र जी परिवार द्वारा समाज को दिये गये योगदान की कीमत को मूल्य में आंकना महाभूल होगी। प्रतापगढ़ से लेकर हल्द्वानी तक तमाम यात्राओं के साथ जूझते इस परिवार ने पूरी धरा को अपना घर-परिवार माना। जमाना भले ही चकाचौंध में मस्त है लेकिन इस प्रकार के परिवारों का मूल्यांकन हमेशा होता रहेगा और यह सबके लिये प्रेरणास्रोत है।

मिश्र जी ने ठीक ही कहा है- वसुन्धरा का भोग वीर करते हैं। इसे इनके परिवार ने व्यवहार में कर दिखाया है। उन्होंने हम सभी को अपनी लोक संस्कृति के साथ प्रकृति से जुड़े रहने का सन्देश देते हुए ‘वीर भोग्या वसुन्धरा’ नाम से अपनी रचनाओं को पिरोया है। इस कृति में कहीं भी पाण्डित्य प्रदर्शन का भाव नहीं है बल्कि सीधा-सरल जीवन जीने वालों की पुकार है। यह कृति श्रीनिवास जी के सैकड़ों शिष्यों का मार्गदर्शन करेगी और बड़े-बुजुर्गों को भी नित नया करने के लिये प्रोत्साहित करेगी, इन्हीं आशाओं के साथ।

दिनांक- 20.7.2022

-डाॅ.पंकज उप्रेती

 

हिमालय संगीत एवं शोध समिति

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